अटल बिहारी वाजपेयी की कालजयी कविताएं

||कदम मिलाकर चलना होगा||
भारत रत्न से सम्मानित देश के दसवें प्रधानमंत्री वाजपेयी जी का जन्म दिन 25 दिसम्बर को सारा देश मनाता है। वे सर्वप्रिय कवि वक्ता और समावेशी राजनीति के पर्याय थे। शांति और एकता को वह बहुत पसंद करते थे।वाजपेयी जी की कविताएं विविध मंचों से ही नहीं देश की महापंचायत संसद तक मे भी सुन चुके हैं। उन्होंने संसद में भो कविताओं को पढ़ा। उनकी कविताओं का एक एलबम भी आया है। उनकी कविता ऊँचाई में प्रकृति का अद्भुत चित्रण किया गया है। वे लिखते हैं”जो जितना ऊंचा होता उतना एकाकी होता है हर भार को स्वयं ढोता है चेहरे पर मुस्काने चिपका मन ही मन रोता है। ऊंचाई व्यक्ति की चाहे बड़े चाहे जितना ऊंचा स्तर हो लेकिन वह सब से हिलमिल कर रहें किसी को साथ ले किसी के संग चले। वे कहते है धरती को बोनो की नहीं ऊंचे कद के इंसानों की जरूरत है। इतने ऊंचे की आसमान छू ले। नए नक्षत्रों में प्रतिभा के बीज बो ले। न बसंत हो न पतझड़ हो सिर्फ ऊंचाई का अंधड़ मात्र अकेलेपन का सन्नाटा।
बाधाएं आती है आएं घिरे प्रलय की घोर घटाएं।पांवों के नीचे अंगारे सिर पर बरसे यदि ज्वालाएं।निज हाथों में हँसते हँसते आग लगाकर जलना होगा।कदम मिलाकर चलना होगा। वाजपेयी जी ने नसीहत दी कि कदम मिलाकर चलने से ही काम बनता है।
वाजपेयी जी एक राजनीतिज्ञ,हिन्दी कवि,प्रसिद्ध पत्रकार और प्रखर वक्ता थे। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन भारतीय राजनीति में सक्रिय होकर बिताया। उन्होंने राष्ट्रधर्म,पांचजन्य वीर अर्जुन आदि राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत अनेक पत्र पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया। वाजपेयी जी ने कई मुद्दों पर पैनी कलम चलाई। उनकी कविता हरी हरी दूब पर.. को देखिए सूर्य एक सत्य है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता मगर ओस भी तो एक सच्चाई है । यह बात अलग है कि ओस क्षणिक है क्यों न मैं क्षण क्षण को जिऊँ ? कण कण में बिखरे सौंदर्य कप पिऊ। सूर्य तो फिर भी उगेगा धूप तो फिर भी खिलेगी लेकिन मेरी बगीची की हरी हरी दूब पर ओस की बून्द हर मौसम में नहीं मिलेगी। उनकी कविता दूध में दरार पड़ गई के अंश देखिये:- खून क्यों सफेद हो गया भेद मे अभेद खो गया। बंट गए शहीद गीत कट गए कलेजे में दरार पड़ गई। दूध में दरार पड़ गई। उनकी अगली प्रसिद्ध कविता कौरव कौन कौन पांडव में आप नारी की दशा को लिखते हैं हर पंचायत में पांचाली अपमानित है बिना कृष्ण के आज। महाभारत होना है कोई राजा बने रंक को तो रोना है। कौरव को कौन पाण्डव टेढ़ा सवाल है दोनों ओर शकुनि का फैला कुटजाल है। अटल जी ने हमेशा जीवन की चुनोतियों का डटकर मुकाबला किया।
वाजपेयी जी ने विपुल साहित्य की रचना की उनके कविता संग्रह न देण्यम न पलायनम,मेरी इक्यावन कविताएं। उनकी प्रतिनिधि रचनाएँ पन्द्रह अगस्त की पुकार कदम मिलाकर चलना होगा हरी हरी दूब पर कौरव कौन कौन पांडव दूध में दरार पड़ गई क्षमा याचना मनाली मत जइयो पुनः चमकेगा दिनकर अंतर्द्वंद जीवन की ढलने लगी सांझ मौत से ठन गई मैं न चुप हूँ न गाता हूँ। एक बरस बीत गया आओ फिर से दिया जलाएं अपने ही मन से कुछ बोलें पड़ोसी से भारत जमीन का टुकड़ा नहीं मैं अखिल विश्व का गुरु महान दुनिया का इतिहास पूछता जो बरसो तक सड़े जेल में राह कौन सी जाऊं मैं दो अनुभूतियां ऊंचाई हिरोशिमा की पीड़ा अपने ही मन से कुछ बोलें एक बरस बीत गया आओ फिर से दिया जलाएं। आदि प्रमुख रचनाएँ आज भी करोड़ो दिलों में हैं। 1977 में अटल जी ने संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी में भाषण देकर राष्ट्रभाषा हिन्दी को प्रचारित प्रसारित करने वाले वाजपेयी जी की कविताएं हमेशा हमेशा के लिए अमर हो गई।
वाजपेयी जी ने कहा था मेरी कविताएं जंग का एलान है।पराजय की प्रस्तावना नहीं। वह हारे हुए सिपाही का नैराश्य नहीं निनाद नहीं जूझते योद्धा का जय संकल्प है। वह निराशा का स्वर नहीं आत्मविश्वास का जयघोष है। उनकी कविताओं का संकलन मेरी 51 कविताएं खूब पसंद किया गया। जिसमें हार नहीं मानूँगा रार नहीं ठानूँगा।
98 पुरोहित कुटी श्रीराम कॉलोनी भवानीमंडी जिला झालावाड़ राजस्थान

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