एक रात चमकते चांद के साथ

कई हिस्सों में शरद पूर्णिमा को लक्ष्मी पूजन सम्पर्क क्रांति का पहला ठहराव अपने ही संग्राम की महा नायिका लक्ष्मीबाई का स्मरण है।
वाला चांद बेशक आज अपनी मोहक छटा साहित्य, सांस्कृतिक उपलब्धियों के लिए किया जाता है। कुछ मान्यताओं के अनुसार राज्य में होता है।
हो आया, ‘खूब लड़ी मरदानी, वह तो झांसी झांसी स्टेशन पर बहुत कम लोग ही बिखेर रहा है लेकिन कोटिशः हृदयों में भी जाना जाता है। लेकिन एक विशेष बात इस रात्रि माता लक्ष्मी रात्रि में यह देखने के अपने नाम की गरिमा के अनुरूप वाली रानी थी।’ अरे वाह! यह भी क्या दिखाई दिये। चाय या अन्य सामान बेचने आजादी की चिंगारी फेंकने वाले सदाबहार यह भी है कि देश और शायद दुनिया में लिए घूमती हैं कि कौन जाग रहा है और जो ऐतिहासिक नगरी ग्वालियर का स्टेशन विचित्र संयोग कि जन-जन के हृदय में वाले हॉकरों और ‘कुली-कुली’ की आवाजे चांद से इसका कोई मुकाबला कैसे हो कटनी पहला नगर है जिसने राजनेताओं के जाग रहा है महालक्ष्मी उसका कल्याण करती काफी बड़ा है। उस लगभग मध्य रात्रि में गुंजती इस कालजयी
लगाने वाले लाल वर्दी दिखाई नहीं दिये। पर सकता है?
झूठे वादों से उकता कर एक किन्नर कमला हैं तथा जो सो रहा होता है वहां महालक्ष्मी चमचमाते साफ सुथरे स्टेशन पर कुछ कदम कविता की रचयिता
हां, नीले आसमान में चमचमाते चन्द्रमा में बुन्देलखंड के गढ़ झांसी से ओरछा तो को अपना महापौर चुना। | डॉ- विनोद बब्बर।। । नहीं ठहरतीं। शरद पूर्णिमा को रासलीला की चहल कदमी के लिए उतरा तो अचानक सुभद्रा कुमारी चौहान
चरखा कातती बुढ़िया जरूर मेरी ओर देख बिल्कुल पास ही हैं लेकिन विश्व प्रसिद्ध गाड़ी आगे बढ़ी तो चांद भी अपना रुख रात भी कहते हैं। क्योंकि शरद पूर्णिमा की नजर दूर आसमान की तरफ उठ गई। वाह! का उस जबलुपर
रही थी। मैं उसे पहचानने की कोशिश कर खुजराहो, आल्हा ऊदल की नगरी महोबा, बदलने लगा। अंधेरा छटने लगा इसी बीच वरिष्ठ समाजशास्त्री । रात को ही भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के आज का विशेष चांद अपनी विशेष कलाओं से नाता है जहां
रहा था कि गार्ड ने हरी लाइट दिखा दी। मैं दतिया, प्राचीन राज्य की ग्रीष्मकालीन दमोह स्टेशन आ गया। गाड़ी के रूकते ही साथ रास रचाया था। शैव भक्तों की मान्यता के साथ चांदनी बरसा रहा था।
कुछ घंटों के
भागकर अपने डिब्बे के द्वार पर खड़ा शरद राजधानी शिवपुरी भी यहां से बहुत दूर नहीं वही शोर जो अक्सर हर स्टेशन पर होता है, जाने कब से शरद पूर्णिमा की हर रात है कि भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र ग्वालियर से मुझे विशेष लगाव है। बाद मुझे
पूर्णिमा के चांद से ।
गुंजने लगा। मैंने गाड़ी से उतर कर हमेशा विशेष उत्साह से जागता रहा हूं। कुमार कार्तिकेय का जन्म इसी दिन हुआ अनेको बार यहां आना हुआ। हर बार पहाड़ी पहुंचना
संवाद करने की वीरो की इस धरती से विदा लेते हुए की तरह यहां लगे नल से दमोह के जल से आश्विन मास की पूर्णिमा को था। अतः इसे कुमार पूर्णिमा भी कहा जाता पर स्थित ऐतिहासिक गुरुद्वारा दाता
कोशिश करने लगा। गाड़ी बहुत तेजी से अपने अगले लक्ष्य की आचमन किया। कुछ मिनट रुकने के बाद कोजागरी या रास पूर्णिमा या कौमुदी है। पश्चिम बंगाल, उड़ीसा व कुछ अन्य बंदीछोड़ के दर्शन करने जरूर गया।
लेकिन न जाने ओर बढ़ रही थी। हरे भरे खेत (अधिकांश पान के बागों के लिए प्रसिद्ध दमोह का व्रत भी कहते हैं। जब नहीं जानता था स्थानों पर इस दिन योग्य पति की प्राप्ति के सिखों के छठे गुरु हरगोबिंद जी महाराज
धान के) शरद पूर्णिमा की उज्ज्वल छटा में प्राचीन नाम दमोवा है से गाड़ी एक बार फिर | कि इसे ‘कोजागरी’ कहा जाता है लिए अविवाहित लड़कियां प्रातः काल स्नान ने तत्कालीन मुगल शासक
अपनी हरित छटा को सम्मिलित कर आगे बड़ी। चारो ओर पहाड़ियों और और ‘को जागरी’ का जागने से क्या संबंध करके सूर्य व चन्द्रमा की पूजा करती हैं। जहांगीर द्वारा इस
‘स्यश्यामलां मातरम्’ का गीत प्रस्तुत कर जंगलों से घिरे इस नगर से सेठ गोविंददास है। लेकिन मैं तब भी जागता था। मां बहुत बात करें अपनी शरद पूर्णिमा की, बचपन स्थान पर कैद
क्यों, रहे थे।
का भी नाता बताया जाता है। गाड़ी पटरियों जतन से खीर बनाती। हम इंतजार करते कि से कब पचपन भी पार हो गया, पता ही नहीं किये गये
आज झांसी के अगला ठहराव सागर है। एक ऐसा दौड़ रही थी लेकिन मन अनन्त में विचरण | वह स्वादिष्ट खीर जल्द से जल्द हमें मिले। चला क्योंकि जीवन के अनेक क्रम यथावत 250
आसमान पर अपनी स्टेशन जो न बहुत बड़ा और न ही बहुत कर रहा था। दिल्ली से ग्वालियर, झांसी, लेकिन शरद पूर्णिमा की खीर साधना के बाद बने रहे। पिछली बार (2017 में) शरद राजाओं को
चांदनी बिखेरता चांद छोटा है। लेकिन साफ-सफाई में औसत से सागर, कटनी, दमोह होते हुए जबलपुर तक मिलती है। परंतु हम बच्चों को न साधना तो पूर्णिमा पर यह क्रम कुछ बदला। शायद यह आजाद कराया था। लेकिन आज
मुझे लक्ष्मीबाई के बेहतर। भीड़ को मानव सागर नहीं कहा जा 909 किमी की इस यात्रा में मन के देवता क्या उसका अर्थ भी मालूम नहीं था। बड़ा नये अनुभव की पूर्व पीठिका ही थी जिसने को केवल ग्वालियर स्पर्श हुआ।।
शौर्य की चमक के सकता लेकिन नदी के प्रवाह से कम न चन्द्रमा मेरे रहे। होने पर सांस्कृतिक संगठनों से जुड़ाव हुआ। शरद पूर्णिमा से ठीक अगली सुबह जबलपुर इसलिए चमकते चांद की उपस्थिति में
सामने कमतर ही मालूम पड़ होगी। मेरी नजर अब भी आसमान पर है। अचानक शोर से ध्यान भंग हुआ। बाहर वहां भी वहीं सब। लगभग आधी रात तक, में अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय केवल भावनात्मक दर्शन ही कर सका।
रहा था।
सोचता हूं- सागर में चांद या चांद पर चन्द्रमा की चांदनी तो भीतर चिंतन खुले आसमान तले गीत, कहानी, कविता, अधिवेशन सुनिश्चित किया था। इसलिए इस गार्ड का इशारा पाकर गाड़ी फिर आगे
वर्षा ऋतु की जरावस्था और
मुझे मालूम है कि सागर। सागर में बारे में बहुत जानकारी एकाएक साथ छोड़ गये। शायद हम अपनी चुटकुले और अंत में स्वादिष्ट खीर। अपने बार शरद पूर्णिमा की रात रेल गाड़ी एक नये बढ़ती है। दौड़ती गाड़ी के साथ
शरद ऋतु के बाल रूप का यह सुंदर आप पूछे बिना उपलब्ध नहीं है परंतु इतना अवश्य याद है आज की मंजिल पर पहुंचने वाले है। जी बिस्तर तक पहुंचते-पहुंचते फिर से उठने अनुभव के साथ बीती। मध्यप्रदेश सम्पर्क समान गति से दौड़ते चन्दा
नहीं रहोंगे कि अगरबत्ती और बीड़ी के पैकेटों पर हां, गाड़ी जबलपुर पहुंच चुकी थी। लेकिन का समय हो जाता।। क्रांति देश की राजधानी से चलकर मामा। मैं गाड़ी के डिब्बे संजोग हर किसी का मन मोह लेता है। पूरे साल ।
सागर को अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए शरद पूर्णिमा वाले चन्दा मामा विदा ले चुके बेशक बसंत मौसम का राजा है लेकिन संस्कारधानी से मिलने की लिए तीव्र गति से में और बाहर हमारे में केवल एक दिन रात्रि (शरद पूर्णिमा) को ही चांद सोलह देखा है। यह नगर कभी पुलिंद राज्य का थे। अपने रथ पर सवार भगवान भास्कर लम्बे जीवन की कामना करते हमारे पूर्वजों दौड़ रही थी। यमुना से नर्मदा की ओर चन्दा मामा। वह
अंग था तभी तो टालमी ने इसे ‘फुलिटों संसार को जीवन्त बनाने के लिए कूच ने सौ बसंत नहीं, सौ शरद मांगे। पूरा वैदिक आयोजित इस यात्रा में भोजनोपरान्त मेरे अपनी पूर्ण । कलाओं वाला होता है। कहते हैं चन्द्रमा से उस रोज अमृत
(पुलिंद) का नगर ‘आगर’ (सागर) कहा करने की तैयारी में थे। | वाड्मय सौ शरद की बात करते हुए कहता सभी साथी निंदा देवी की गोद में पहुंच गये। एकाग्रता के साथ
गया है।
स्टेशन से बाहर आकर हमने उस आवास है- जीवेम् शरदः शतम। कर्म करते हुए सौ वातानुकूलित कक्ष होने के कारण भीड़ नहीं चाँदनी बरस रहे
| एक सहयात्री ने रात्रि में मुझे जिम्मेवारी व्यवस्था की ओर प्रस्थान किया जहां अगले शरद जीवित रहें। तो स्पष्ट है कि इसका है लेकिन मेरी आंखो से नींद गायब है। बार- हैं। इस प्रक्रिया चन्द्रमा पृथ्वी के बहुत नजदीक होता है और उसकी उज्जवल किरणें
दी थी कि अगर उसकी आंख न खुले तो तीन दिन रहना है। स्नान ध्यान के बाद विशेष महत्व होना चाहिए। बसंत जीवन में बार लेटता हूं, उठता हूं। फिर लेटना। फिर में जीवन है।
ग यकित वर्ष कटनी आने से पहले जरूर जगा दें। मैंने कल्याण मण्डपम् पहुंचे जहां शरद पूर्णिमा के राग, रस-रंग का प्रतीक है। परंतु जीवन घर्ष लेटना। आंख बंद करने की कोशिश की पर इसीलिए जीवन्तता
अपने कर्तव्य का निर्वहन किया। बंगाला चन्द्रमा की चांदनी देश भर के साहित्यिक का प्रतीक तो शरद ही है। वर्षा ऋतु की बेकार। तब मैंने खिड़की का पर्दा हटाया तो का आनन्द है।
भर निरोग रहता है। उसका शरीर पुष्ट होता है।
भाषी को ‘नोमोस्ते’ कहते हुए हिलाया तो सितारों में नजर आई लगातार तीन दिन जरावस्था और शरद ऋतु के बाल रूप का आज का चांद सामने था। वाह चांद! तेजी आनन्द के विभिन्न रूप
ऐसा उन्होंने ‘शुब प्रोभात’ कहकर मेरा उत्साह तक सेठ गोविन्द दास, श्रीमती सुभद्रा कुमारी यह सुंदर संजोग हर किसी का मन मोह लेता गति से दौड़ रही रेलगाड़ी लेकिन तू न कभी है। रंग है तो स्वाद भी। अपने
क्यों? लो बढ़ाया। निवृत्ति के बाद उन्होंने अपना चौहान, श्री भवानी प्रसाद तिवारी, व्यंग्य है। पूरे साल में केवल एक दिन रात्रि (शरद पीछे छूटा और न ही गाड़ी को पीछे छोड़ा। स्वाद और सुगंध के लिए विश्व
बिना पूछे बताये सामान समेटा तब तक चूना पत्थर के शहर शिरोमणि हरिशंकर परसाई, महर्षि महेश पूर्णिमा) को ही चांद सोलह कलाओं वाला गाड़ी दौड़ती रही, दौड़ती रही। बीहड़ और प्रसिद्ध काली मूछी वाल चावल की
देता हूं- यूं तो वर्ष भर के रूप में ख्यात कटनी का स्टेशन सामने योगी, प्रसिद्ध दाशर्निक रजनीश उर्फ ओशो होता है। कहते हैं चन्द्रमा से उस रोज अमृत घाटियों के बीच। नदियों को फांदती हुई। नगरी डबरा पर रूके बिना अब गाड़ी फिर
में बारह बार पूर्णिमा आती था। वे हाथ हिलाते हुए ‘नोमोस्ते’ कहते हुए की इस धरती पर अपनी साहित्यिक प्रतिभा बरसता है। इसलिए शरद अमरत्व का प्रतीक हरे-भरे वनों को पीछे छोड़ते हुए और कई से उत्तर प्रदेश में प्रवेश करते हुए झांसी
है परंतु शरद पूर्णिमा केवल एक आगे बढ़ गये। कटनी नदी के तट पर बसे की छटा बिखेरने वाले इन सितारों ने भी है। इस रात्रि चन्द्रमा पृथ्वी के बहुत घंटों बाद ग्वालियर रुकी तो मालूम हुआ हर स्टेशन पर रूकी तो मुझे भारतीय स्वतंत्रता
बार। वर्ष भर घटते-बढ़ते रहने कटनी के साथ एक समृद्ध विरासत है। यह ‘साहित्य की सामथुय’ से परिचित कराया। नजदीक होता है और उसकी उज्जवल
। अखिल भारतीय साहित्य परिषद के किरणे पेय एवं खाद्य पदार्थों में पड़ती हैं तो
राष्ट्रीय अधिवेशन दूसरे दिन आयोजित उसे खाने वाला व्यक्ति वर्ष भर निरोग रहता
शोभायात्रा में भगवा पाग पहने हजारो है। उसका शरीर पुष्ट होता है। भगवान श्री
साहित्यकारो का स्वागत परम्परागत ढंग से कृष्ण ने गीता के अध्याय15 के 13वें
संगीत की धुनो पर झूमते कलाकारों तथा श्लोक में कहा है– पुष्णामि चौषधीः सर्वाः
पुष्प वर्षा कर नगरवासियों ने किया लगा सोमो भूत्वा रसात्मकः।। अर्थात् रसस्वरूप
जैसे शरद पूर्णिमा के चांद के बाद महर्षि अर्थात् अमृतमय चन्द्रमा होकर सम्पूर्ण
जाबालि की नगरी के सुसंस्कृत नागरिक औषधियों को अर्थात् वनस्पतियों को पुष्ट
साहित्य के सितारों पर ‘धुआंधार’ अपनी करता हूँ।
छटा बिखेर रहे हैं। सोचता हूं- जीवन को | लंकाधिपति रावण शरद पूर्णिमा की रात
साहित्य संवारता है या साहित्य को कुछ | किरणों को दर्पण के माध्यम से अपनी नाभि
जीवान्त लोग? लेकिन देख रहा हूं साहित्य पर ग्रहण कर पुनर्योवन शक्ति प्राप्त करता
से संस्कृति है तो संस्कृति के हमारी था। इसदिन औषधियों की स्पंदन क्षमता
पहचान। संस्कारधानी के बहुमंजिला भवनों अधिक होती है। रसाकर्षण के कारण जब
से शोभायात्रा पर बरसते पुष्प यहां की अंदर का पदार्थ सांद्र होने लगता है, तब
संस्कृति की सुगंध को देशभर तक पहुंचाना रिक्तिकाओं से विशेष प्रकार की ध्वनि उत्पन्न
सुनिश्चित कर रहे हैं। यमुना तट से शरद होती है। इस दिन चंद्रमा की किरणें विशेष
पूर्णिमा की रात आरम्भ हुआ चांदनी का यह अमृतमयी गुणों से युक्त रहती हैं जो
अविस्मरणीय सफर नर्मदा तट की संस्कृति कईबीमारियों का नाश कर देती हैं। यही
की सुगंध के साथ संपन्न हुआ। कारण है कि शरद पूर्णिमा की रात को लोग
| यह संयोग ही है कि उत्तर प्रदेश हिंदी अपने घरों की छतों पर खीर रखते हैं जिससे
संस्थान शरद पूर्णिमा के दिन एक कार्यक्रम चंद्रमा की किरणें उस खीर के संपर्क में
आयोजित कर रहा है जिसमें इन पंक्तियों के आती है। उस खीर के सेवन से
लेखक को अहिंदीभाषी होते हुए भी हिंदी जीवनदायिनी ऊर्जा प्राप्त होगी। जिन लोगों
और भारतीय भाषाओं को समृद्ध करने में को श्वास संबंधी रोग होते हैं, इस विशेष दिन
उल्लेखनीय योगदान के लिए ‘सौहार्दुध खीर में जड़ी बूटियों से बनी औषधि
सम्मान प्रदान किया जा रहा है। अतः मिलाकर ग्रहण करने से उन्हें सदा के लिए
पिछली बार की तरह इस बार भी शरद रोगों से मुक्ति मिलती है। केरल में इसदिन
पूर्णिमा (24 अक्टूबर, 2018) की रात्रि कुछ विशेष औषधि से उपचार किया जाता
गोमती (लखनऊ) से यमुना (दिल्ली) की है। देशभर से विशेष रेलगाड़ियों से लोग वहां
ओर दौड़ती रेल में बीतने वाली है। आशा पहुंचते है।
ही नहीं विश्वास है कि इस बार भी मान्यता है कि माता लक्ष्मी का जन्म शरद
चन्दामामा अपनी विशिष्ट छटा बिखेरते हुए पूर्णिमा के दिन हुआ था। इसलिए देश के
अति विशिष्ट अनुभव करायेंगे।

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